गुरुवार, 28 सितंबर 2017

शरीक़

हर पहर जानें कितनी आवाज़े रोती है,
कभी वजहों संग तो कभी बेवज़ह कितनी साँसे खोती है।

इस ठंड में सिसकियां कुछ,
वो नन्हे बेजुबानो की कपकपाती है।
किसी कोने में जिंदगानी जीती तो कभी मरती जाती है।
तो कुछ आवाज़े भी देखी हमने आज,
 जो अपने आखिरी पड़ाव में मज़बूर होके चुप हो जाती है।

समझ ही नही आया दर्द कहा गहरा सा था,
जो बिखरे से थे नन्हें चार पैरों के मुसाफ़िर,
या जो अपनों संग लड़खड़ाते कदमो में भी तनहा सा थे।

जाने ये मलाल इस सब बातों का क्यों होता है,
शायद इसलिए कि कहीं न कही इन सब मे
कभी वजूद अपना भी शरीक़ से होता है।


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